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Divyavani: Sanskrit the divine language

How do we make our all-round development. How do we proceed on the path of progress connecting ourselves to that supreme consciousness? How can Sanskrit help us in this?

Read this article in English

दिव्यवाणी संस्कृत 

ज्ञान पिपासुयों के लिए ये शोध का विषय रहा है कि संस्कृत का हमारे जीवन में क्या महत्व है? हम संस्कृत क्यों जाने, क्यों पढे, उससे भी बढ़कर संस्कृतमय जीवन क्यों आवश्यक है| इन सारे प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए ये जानना अतिआवश्यक है कि संस्कृत है क्या? क्या ये केवल एक भाषा है?

A beautiful picture of Bhagwan Krishna

नहीं |

संस्कृत एक सेतु है, स्वयं को उस परम चैतन्य से जोड़ने का, एक माध्यम है उस परमानन्द रूप श्रीकृष्ण के मुरली की प्रेमधुन में लीन हो जाने का| वो धुन जिसमे सम्पूर्ण ब्रम्हांड ‘मैं’ को भूलकर एक ही लय में नृत्य करने लगता है और पूर्णतया कृष्णमय हो जाता है | यहाँ पर ये प्रश्न उठता है कि बचपन से ही संस्कृतमय जीवन क्यों अपनाना चाहिए| हम अन्य विषयों की तरह भी तो संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, परंतु क्या केवल ज्ञान प्राप्त करना ही पर्याप्त होगा?

नहीं|

हमें केवल ज्ञान प्राप्ति तक स्वयं को नहीं समेटना है| हमे उस ज्ञान को अपने जीवन में उतारना है| वो मूल तत्व जो हमें अचेतन से चैतन्य की ओर स्वयं हाथ पकड़कर ले जाता है| अंधकार से उजाले की ओर ले जाता है|  और उस प्रकाश में हम अपने वास्तविक स्वरूप को देख पाते हैं जो कृष्णमय है| हम हमेशा कहते हैं कि बच्चें ईश्वर का रूप होतें हैं क्यों, क्योंकि उनके और उस परमेश्वर के मध्य कोई आवरण नहीं होता | ईश्वर जो स्वयं प्रेममय है उसी प्रेम का संचार सीधा बच्चों में होता है और बच्चें सर्वत्र उसी अलौकिक प्रेम को प्रसारित करते हैं, किन्तु जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है आवरण बढ़ता जाता है और वही बच्चा ‘मैं’ बन जाता है |

An image with main and I written over it many times

‘मैं करता हूँ’, ‘मैंने किया’, ‘मैं करूंगा’ |

वो भूल जाता है कि करने वाला तो एक ही है वो परमेश्वर,मानव तो निमित्त मात्र है| इसी सत्य को भूलकर भौतिक प्रगति करने की दौड़ मे लग जाता और इसी प्रगति को ही वास्तविक प्रगति मानता है जबकि उसी क्षण उसकी आंतरिक प्रगति का ह्रास होता जाता है, क्योंकि उसने स्वयं को उस चैतन्य से दूर कर लिया है जो उसकी आंतरिक प्रगति का स्रोत है| अब प्रश्न ये उत्पन्न होता है कि कैसे हम अपना सर्वांगीण विकास करें| हम उस परमचैतन्य से स्वयं को जोड़ते हुए प्रगति के मार्ग पर कैसे आगे बढ़े?

संस्कृत हमारी इसमें कैसे सहायता कर सकती है? यदि हम अपनी अमूल्य धरोहर वेदों को पढ़ेंगे तो जान सकते हैं कि हमारे मंत्रद्रष्टा ऋषियों ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में हमारा मार्गदर्शन किया है| यहाँ एक मंत्र को उदाहरण स्वरूप रख रही हूँ- 

अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम् होतारं रत्नधातमम् | ऋग्वेदः 1.1.1.

A picture of fire

वेदों में जहाँ भी अग्नि की स्तुति की गई है, अग्नि को दो रूपों मे देखा गया है- एक बाह्य अग्नि जिसमे वैदिक मंत्रों के द्वारा आहुति दी जाती है, एक आत्मा रूपी आंतरिक अग्नि| प्रस्तुत मंत्र मे इसी आंतरिक अग्नि की स्तुति करते  हुए ऋषि कहते हैं-

“हे अग्नि! आप हमारे अंदर प्रज्ज्वलित हों, इस जीवनरूपी यज्ञ के आप ही पुरोहित हैं, हमारे जीवन का संचालन करें| आप पूर्णपरमेश्वर हैं, आप ही उचित समय को जानने वाले हैं| दिव्यस्वरूप  देवताओं का आवाहन आपके माध्यम से होता है तथा परमानन्द का अनुभव आपके द्वारा ही संभव है| मैं अपने मन, कर्म, विचार,सब आपको समर्पित करता हूँ| आप हमें उस चैतन्य से जोड़कर मुझ अपूर्ण को पूर्णता प्रदान कीजिए| आप हमारा मार्ग प्रशस्त करें जिससे ईश्वर और मेरे बीच के सारे आवरण हट जाएं और मैं अपने वास्तविक स्वरूप को कृष्णमय है,प्रेममय है उसमे लीन हो सकूँ|” मुक्ति/ मोक्ष प्राप्त कर सकूँ| वास्तविक मुक्ति क्या है? इस पर प्रकाश डालने का छोटा सा प्रयास किया है इसके लिए श्रीमदभगवतगीता श्लोक को उदाहरण स्वरूप रख रही हूँ-

मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।

मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोSसि मे ।।18/65

Sri Krishna and Arjun in the Mahabharat

अर्जुन तू मुझमें ही अपना अटूट चित्त लगा, मेरा भजन कर, मेरा पूजन कर, तू मेरा प्रिय है, मैं विश्वास दिलाता हूँ कि तू मुझे प्राप्त कर लेगा अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर लेगा | यहाँ पर मोक्ष प्राप्त करने से तात्पर्य जीवन से मुक्ति नहीं है,बल्कि उस परमानन्द श्रीकृष्ण में अंतर्निहित होकर स्वयं कृष्णमय ही जाना ही मुक्ति है और ये ही हमारे जीवन का परम लक्ष्य है| इसके लिए आपको देहत्याग की आवश्यकता नहीं है | स्वयं को श्रीकृष्ण को सौंप दें और ये प्रार्थना करें कि हे मधुसूदन! एक ऐसा बाण चलाओ जो मेरे और तुम्हारे बीच सारे आवरणों को भेद दे और मैं तुम्हें पा सकूँ, हे मुरलीधर! मुरली की वो तान छेड़ो जिसका चुंबकीय आकर्षण मुझे तुमसे ऐसा जोड़े कि पुनः पृथक होने की संभावना लेशमात्र भी ना हो ये ही मेरी मुक्ति है| श्रीमदभगवतगीता मे इसी को साधर्म मुक्ति कहा गया है | अपने धर्म का पालन करते हुए उस परमानन्द श्रीकृष्णा को पा लेना ही वास्तविक मुक्ति है, मोक्ष है ,अमरत्व है| जो भी कार्य करो उस कृष्णा को समर्पित करते हुए करो, हमने हर क्षण हर  विचार, हर भाव तुम्हारे श्रीचरणों मे डाल दिया है अब तुम जैसे चाहो मेरे जीवन को संचालित करो| मेरी नाव के तुम ही खेवैया हो जिधर चाहो ले चलो

इस प्रकार “मैं” के भाव को त्याग कर कृष्ण के प्रेम में लीन होकर कृष्णमय हो जाना ही परमानन्द है,  जिसको ही अमरत्व माना गया है, मोक्ष कहा गया है|

ये परमानन्द अमृतसदृश ज्ञान क्या दिव्यवाणी संस्कृत के अलावा कहीं और से प्रवाहित हो सकती है? नहीं,संस्कृत स्वयं में अमूल्य धरोहर है|  

धन्यवाद  



Divyavani Sanskrit

            It has been a matter of research for knowledge seekers that what is the importance of Sanskrit in our life. Why we should know Sanskrit, why study Sanskrit, and why is it important to live a Sanskritic life? To get the answer to all these questions, it is vital to understand what is Sanskrit. Is it just a language? No.

Sanskrit is a bridge that connects oneself with that supreme consciousness. It is a medium to get absorbed in the love of the blissful form of Shri Krishna's murli. That tune in which the whole universe forgets the 'I' and starts dancing in one rhythm and becomes completely Krishna. Here the question arises that why should one adopt Sanskritic life from childhood. We can acquire knowledge of Sanskrit like other subjects, but will it be enough to acquire knowledge alone? No.

No, we do not have to restrict ourselves to mere attainment of knowledge. We have to apply that knowledge in our life. That fundamental element which takes us from the unconscious to the consciousness by holding our hands leads us from darkness to light and in that light, we can see our true Krishnamaya nature. We always say that children are the form of God because there is no cover between them and God. God, Himself is loving, the same love is transmitted directly to children and children spread the same supernatural love everywhere, but as their age increases, the cover grows and that child becomes 'I'.

'I do', 'I did', 'I will'.

He forgets that there is only one doer, and that is God, man is only an instrument. Forgetting this truth, he starts in the race to make material progress and considers this progress only as real progress, while at the same moment his inner progress gets diminished because he has distanced himself from the consciousness which is the source of his inner progress. Now the question arises that how do we make our all-round development. How do we proceed on the path of progress connecting ourselves to that supreme consciousness? How can Sanskrit help us in this?

If we read the Vedas, our invaluable heritage, then we will learn that our sages have guided us in very clear words. Here I am placing a mantra as an example-

Agnimile Purohitam Yagyasya Devam Ritvijam

Hotaram Ratnadhatamam | Rigveda: 1.1.1.

Wherever Agni is praised in the Vedas, Agni is seen in two forms – an outer fire in which the sacrifice is made through Vedic mantras, an inner fire in thand e form of a soul. Praising this inner fire in the present mantra, the sage says-

‘O fire! You are ignited in us, you are the priest of this life-like sacrifice, conduct our lives.’

You are the Supreme Lord, you are the one who knows the right time. The invocation of the gods in the divine form is through you and the experience of ecstasy is possible only through you. I dedicate my mind, deeds, thoughts, and everything to you. By connecting us with that Chaitanya (awareness), give completeness to my being. You pave the way for us so that all the veils between God and me are removed and I can merge into my true nature, which is Krishna-loving.

I can attain liberation/moksha. What is real salvation? A small effort has been made to throw light on this, for this I am taking the Shloka of Shrimad Bhagwat Geeta as an example-

Manmana bhava madbhakto madyaji mother namaskuru.

Mamevaishyasi satyam te pratijane priyosi mein... 18/65

Arjun, you put your mind totally in me, sing my bhajans, worship me, you are my beloved, I assure that you will achieve me, that is, you will attain salvation. To attain moksha in this context does not mean freedom from life, but to become immersed in that ecstasy that is Shri Krishna. To become Krishna-may itself is liberation and this is the ultimate goal of our life. You don't need to die for this. Surrender yourself to Shri Krishna and pray that O Madhusudan! Shoot an arrow that will pierce all the veils between me and you and I may find you, O Murlidhar! Tear that tone of the flute whose magnetic attraction connects me with you in such a way that there is no possibility of separation again, this is my salvation. In Shrimad Bhagwat Geeta, this is called religious liberation. To attain that ecstasy Sri Krishna while following your dharma is the real liberation, salvation, and immortality. Whatever work you do, do it by dedicating it to Krishna, we have put every thought, every emotion at your feet, and now operate my life as you wish. Krishna, you are the boatman of my boat, take me wherever you want

Thus renouncing the feeling of "I" and becoming absorbed in the love of Krishna, it is bliss to become Krishna, which is considered immortality and is called salvation.

Can this divine nectar-like knowledge flow from anywhere other than Sanskrit? No, Sanskrit itself is an invaluable heritage.

 



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