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संस्कृत और संस्कृति

संस्कृत : महान गौरवशाली इतिहास और गरिमापूर्ण विरासत की अभिगामिनी

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संस्कृत भाषा की विशेषता को समझिए आप। यह साधारण भाषा नहीं है, बल्कि देव वाणी है, जिसमें एक-एक अक्षर मनुष्य की वृत्तियों को संस्कारित करने हेतु बनाया गया है। संस्कृत का जन्म जिन ऋषियों ने अपने आत्मानुसंधान में किया था, वे इसकी अलौकिक शक्ति सामर्थ्य से परिचित थे। उन्हे ज्ञात था कि इसमें अदृश्य रूप से मनुष्य के संस्कारों को परिशोधित करने की क्षमता उपस्थित है। वे इसे लौकिक नहीं पारमार्थिक दृष्टि से उपयोग में लाने के इच्छुक थे। इसी कारण उन्होंने चेतना के उच्चतम् शिखरों की परिगाथा संस्कृत भाषा एवं इसकी दिव्य शब्दावली में उपस्थित ऊर्जा संचरण क्षमता को निरूपित किया। वे इसे देवत्व को उभारने का माध्यम बनाना चाहते थे, बस इस सरल सी इच्छा ने उन्हें इसके निर्माण की प्रेरणा दी और वे अपने इस प्रयोजन में सफल भी हुए।

ancient Rishi who made sanskrit

संस्कृत में उल्लिखित मंत्र दैवीय आदेश का प्रतिवहन करते हैं, उनमें मनुष्य के मन को एकाग्र करने की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। मन बना ही प्राण के संवेगों से है और मंत्रों में शरीर की प्राण ऊर्जा को संग्रहीत करने, नियंत्रित करने, निर्दिष्ट दिशा में प्रेरित करने की क्षमता है। इस कारण चाहे-अनचाहे मनुष्य में इन मंत्रों के उच्चारणक्रम में देव प्रवृत्तियाँ उभर ही आती हैं। यह आश्चर्यजनक है कि कितनी गूढ़ता से ऋषियों ने संस्कृत का एक-एक अक्षर उत्कीलित किया, क्योंकि इन अक्षरों का निरूपण चेतना के उच्चतम् कोटि के परिष्कार से ही संभव बन पड़ता, इनमें सन्निहित दिव्य ऊर्जा तभी अपना प्रभाव छोड़ती, जब मंत्रदृष्टा ऋषि उन्हें अपनी सर्वोच्च पात्रता का आधार देते।


 

संस्कृत के दिव्य शब्द किसी वैज्ञानिक विमर्श का कारण बने या न बने परंतु जिस चेतना विज्ञान को समझा जाना चाहिए, उसे तर्क- वितर्कणाओं में धूमिल न किया जाए। वह वास्तविकता तक आपको ले जाएगा, बशर्ते आप इसके लिए तैयार हों। उपनिषदों में शब्द की जिन चार अवस्थाओं का वर्णन आता है- बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ती, परा वे यही बताती है कि हर पदार्थ , हर वस्तु का स्वरूप देखने में स्थूल लगने पर भी, सूक्ष्मतर है, वह पदार्थ अपनी स्वरूपात्मकता से, अपनी वास्तविकता से निश्चित ही आपको परिचित कराएगा यदि आप उसके साथ ताल मेल बिठाना सीख जाएं तो। इसी तादात्म्य की स्थापना के लिए संस्कृत का निर्माण हुआ है जो मात्र भाषा नहीं अस्तित्व की एकता की परिचायक है। यह इस सुनिश्चित आधार पर टिकी है कि संसार की कोई भी वस्तु चेतनाविहीन नहीं, और यदि हम उस चेतना को सभी पदार्थों में स्वीकारते हैं, तो हमें यह भी स्वीकार लेना चाहिए कि यज्ञ-कर्मकांड में देव शक्तियों के आवाहनक्रम में हम उस चेतना का ही पूजन-अर्चन कर रहे हैं, उसे ही पदार्थ में मौजूद दिव्य-सत्ता को उभारने, जगाने, और अपना विस्तार करने को प्रेरित कर रहे हैं।

वसुधैव कुटुंबकम्


तभी तो 'वसुधैव कुटुंबकम्' लोगों के लिए ही नहीं, समस्त संसार की सभी प्रकार की विभिन्नताओं, पशु पक्षी, वृक्ष उपवन, नदी, पर्वत, पठार, ग्रह नक्षत्र, आकाशगंगाओं, महासूर्य आदि सभी के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसे साधारण बोल-चाल का परिवार न मान लीजिएगा, बल्कि आत्मा इसका केंद्रीय तत्व है।

विश्व में जो उपद्रव 

population explosion
अब जब हम इतना कुछ जान ही चुके हैं फिर हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि आज विश्व में जो उपद्रव मचे हुए हैं, मनुष्य का मनुष्य के प्रति बैर भाव इस हद तक बढ़ गया है कि वह समूची मानवता के लिए ही खतरे का कारण बन गया है, राष्ट्रों के आपसी तनाव विकट रूप ले रहे हैं, बढ़ती जनसंख्या और उसमें संसाधनों की आपूर्ति का संकट, विनाशकारी परिस्थितियों को आमंत्रित करते मनुष्य के पर्यावरण विरोधी प्रकल्प, सचेत होने के स्थान पर मनुष्य का आडंबरयुक्त और संवेदनविहीन जीवनयापन आदि आदि वे बातें हैं जो सचेत करती हैं कि हमें समय की गरज को भांप कदम बढ़ाने चाहिए, यदि अब भी न सुधरे तो विनाश का भागी सबको बनना होगा, और यदि आत्मचेतना जाग गई, सही गलत का भेद जीवन दृष्टि में स्पष्ट हो गया फिर संभावना है कि हम धरती के कल्याणकारी भविष्य का निर्माण कर के रहेंगे, अपनी आहुति इस विश्व-यज्ञ में देकर रहेंगे, युग परिवर्तनकारी परिस्तिथियाँ निर्मित करेंगे।

संस्कृत : महान गौरवशाली इतिहास और गरिमापूर्ण विरासत की अभिगामिनी

इसी परिप्रेक्ष्य में संस्कृत और उससे जुड़ी हमारी संस्कृति का यहाॅं उल्लेख हो आया, जो मात्र बोलने की नहीं, दिखावट की नहीं एक महान गौरवशाली इतिहास और गरिमापूर्ण विरासत की अभिगामिनी, संसार की सर्वोत्कृष्ट कृति है। उसे ही संरक्षित करना, पुनर्जीवित करना हम सभी का उत्तरदायित्व है। इसीलिए उपरोक्त शब्द कुछ इस प्रकार आ पड़े कि लिखने वाले को बिना संकोच के इतना सब कुछ लिखा दिया। लेकिन लिखाया उस प्रेरणा ने एक ही कारण से है कि आप चेतना की उच्चतम् संभावनाओं को जाग्रत कर इस जीवन को धन्य बनाएँ।

 

Sanskrit and Culture

Understand the uniqueness of Sanskrit language. This is not an ordinary language, but God's speech, in which each and every letter has been made to cultivate human instincts. The sages who originated Sanskrit in their self-research, were aware of its supernatural potential, they knew that it has the ability to refine man's rituals. They wanted to use it from a spiritual point of view, not worldly. For this reason, they narrated the story of the highest peaks of consciousness in the Sanskrit language and its divine vocabulary, representing the power of transmission of energy. They wanted to make it a medium to raise the divinity, just this simple desire inspired him to build it and he was successful in his purpose.

The mantras mentioned in Sanskrit convey the divine order, as they have amazing ability to concentrate the human mind. The mind is made up of the impulses of prana and mantras have the ability to store, control, and propel the prana energy of the body in a specified direction. For this reason, whether or not desired, God's tendencies emerge in man during the chanting of these mantras. It is amazing how intricately the Rishis engraved each and every letter of Sanskrit, because the representation of these letters would have been possible only with the highest degree of sophistication of consciousness, the divine energy contained in them would have exerted its effect only when the seer sages had given them their highest form. Giving the basis of eligibility.

The divine words of Sanskrit may or may not become the reason for any scientific discussion, but the science of consciousness which should be understood, should not be tangled in arguments. They will lead you to reality, if you are ready for it. In the Upanishads, the description of the four stages of the word- Baikhari, Madhyama, Pashyanti, Para, they tell that every substance, even though it looks gross in appearance, it is more subtle, that substance is more subtle by its form, by its reality. Will definitely introduce you if you learn to adjust with it. Sanskrit has been created for the establishment of this identity, which is not just a language but a sign of the unity of existence. It rests on the sure foundation that nothing in the world is devoid of consciousness, and if we accept that consciousness in all things, then we must also accept that in the process of invoking the Divine Powers in the sacrificial rituals, we must also accept that consciousness. We are worshiping, we are motivating him to raise, awaken, and expand the divine power present in the matter.

That's why 'Vasudhaiva Kutumbakam' has been used not only for people, but for all kinds of variations in the whole world, animals, birds, tree groves, rivers, mountains, plateaus, planets, constellations, galaxies, great sun etc. Don't consider it a family of ordinary speech, but the soul is its central element.

Now that we have come to know so much, then we should also understand that the disturbances that are taking place in the world today, the enmity of man towards man has increased to such an extent that it becomes a cause of danger for the entire humanity. The tensions between the nations are taking an acute form, the increasing population and the crisis of supply of resources in it, the anti-environmental projects of man inviting destructive situations, instead of being conscious, the ostentatious and insensitive living of man, etc., are the things that alert. It is our belief that we should step forward realizing the need of the hour, if it does not improve even now then everyone will have to become a part of the destruction. If self-consciousness wakes up, the difference between right and wrong becomes clear in the vision of life, then there is a possibility that we will continue to build a welfare future of the earth, keep sacrificing ourselves in this world-sacrifice, create epoch-changing conditions.

It is in this context that Sanskrit and our culture related to it are mentioned here; the langugae sof Sanskrit is not just of speaking, and it is definitely not for showing off, instead its a great glorious history and dignified heritage, it is the best work of the world. It is the responsibility of all of us to preserve and revive it. That's why the above words flowed so effortlessly, that the writer wrote so much without any hesitation. The inspiration for this writing was so that you make this life blessed, by awakening the highest possibilities of consciousness.



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