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संस्कृत: विश्व को भारत की अमूल्य देन

Sanskrit: India's invaluable gift to the world

संस्कृत: विश्व को भारत की अमूल्य देन

संस्कृत यानी वह भाषा जिसमें कोई त्रुटि नहीं। जो स्वयं में इतनी सशक्त है, कि उसके सामने कोई भी अन्य भाषा इतनी प्रभावोत्पादक नहीं हो पाती, मनुष्य के अंतराल की सच्चाइयों को इतनी स्पष्टता से प्रकट नहीं कर सकती। अन्य भाषाओं में उन्हें बनाने वालों के संस्कार होते हैं, परंतु संस्कृत में संस्कार नहीं मात्र विशुद्ध ऊर्जा है, जो मनुष्य के स्वभाव और उसकी चिंतनशैली के लिए परिवर्तनकारी है। संस्कृत वेदों की भाषा है, और वेद इस धरती पर ज्ञान की प्रथम धारा का नाम है। वे आए चेतना की विशुद्धतम् स्तिथि से थे, उनका जन्म चेतना के उर्धवगमन के लिए हुआ था।
संस्कृत महान गौरवशाली है, इसमें संसार के सर्वोत्कृष्ट काव्य, कथा साहित्य, उद्धरण भरे पड़े हैं, विश्व के सबसे श्रेष्ठ चिंतकों जिनमें हमारे ऋषि सर्वप्रथम आते हैं, इसे अपनी प्रेरणा को मनुष्य समुदाय के समक्ष रखने का माध्यम बनाते हैं। कोई भी मनुष्य पूर्ण रूप से परिपक्व नहीं, शुद्ध नहीं, पवित्र नहीं परंतु संस्कृत और उससे जुड़ी हमारी संस्कृति हर प्रकार से परिपूर्ण है, अपने में एक दैवीय आदेश को लिए है, और मनुष्य समुदाय के कल्याण की भावना से उद्भूत हुई है। इसे इसके महान प्रयोजन से पहचाना जाए। यह तथ्य-तर्क से ऊपर अनुभूति और आत्मविकास का आधार लिए हुए है।
सुसंस्कारिता के अभिवर्धन हेतु हमें जन-जन को संस्कृत की महिमा से परिचित कराना चाहिए। इसे एक नैतिक-सामाजिक जिम्मेदारी बनाना चाहिए कि हम संस्कृत सीखेंगे और अपनी संस्कृति से परिचित होंगे, जो कि मानव में देवत्व की पक्षधर है। जो किसी प्रकार के मानव जनित दोषों से परे, इस विश्व के समग्र कल्याण की द्योतक है। उसे उसकी गरिमा अनुरूप समाज में स्थान मिले, इसी प्रयोजन से यह लेख भी लिखा जा रहा है।
संस्कृत वैज्ञानिकों के परीक्षण में खरी उतरती है। यह उस केंद्रीय तत्व की ओर उनकी दृष्टि को उन्मुख करती है जिसे वह पदार्थ की प्रणालियों में परिभाषित तो करना चाहते हैं परंतु उत्तर उन्हें चेतना के क्षेत्र में ही मिलता दिखाई दे रहा है। संस्कृत ब्रह्मांडीय ऊर्जा के कार्यान्वयन की नीति व्यवस्था को स्पष्ट करती है, इसे उसी निमित्त प्रयोग में लाया गया था। सृष्टि के गूढ़तम् रहस्यों पर प्रकाश डालती ऋषियों की यह अतिप्राचीन भाषा, किसी प्रकार के प्रमाणीकरण की आवश्यकता से परे है, पर फिर भी चेतना और ब्रह्मांड से जुड़ी जिन बातों को इसके मंत्रों में निरूपित किया गया, उन्हें वैज्ञानिक कसौटियों पर खरा उतरते पाया गया है।
वैज्ञानिकों का यह कहना है कि संस्कृत उनके प्रयोग-परीक्षण के लिए एक अनुकूल भाषा ठहरती है, यह गणितीय सूत्रों की व्याख्या जिस अचूकता से करती है, उसे देख कर यही लगता है कि सृष्टिकर्ता ने इसी की तारतम्यता में सृष्टि का सृजन किया है। यह सृष्टि की उत्पत्ति, निर्माण और अंतत: ध्वंस को एक चेतनात्मक दृष्टि से निरूपित करती है, जिसमें समस्त ब्रह्मांड के गतिचक्र को चेतना का अवलंबन लेकर समझाया गया है। ऋषियों की दृष्टि में ग्रह नक्षत्र पदार्थ के पिंड भर नहीं, एक व्यापक समायोजन के जीवंत प्रतीक थे, उन्हें देव शक्तियों के रूप में उपमाएँ दी गईं।
क्योंकि यह भाषा समस्त जड़ चेतन को एक सूत्र में पिरो देती है, इसलिए इसकी उपयोगिता यज्ञ-कर्मकांडों में विशेष महत्व की हो जाती है। इसके द्वारा उच्चारित मंत्रों में सूक्ष्म जगत को कंपित, स्पंदित, आलोकित करने की क्षमता है। तभी ऋषियों ने अपने विशिष्ट प्रयोजनों के लिए, किसी आत्यंतिक समस्या के समाधनार्थ इसे उपयोग में लाया था। वे इसकी दिव्य संचार क्षमता से परिचित थे, इसलिए इसके द्वारा सूक्ष्म प्रयोग-परीक्षण का उन्होंने सफल प्रयास किया और इसी का परिणाम है कि हम एक महान संस्कृति के अंशधर बने, यह देश उनके अनुदानों से अनुग्रहीत हुआ विश्व का पालनहार, ज्ञानदाता कहलाया, सुसभ्यता का उन्नायक और संस्कृतियों का उद्‌गम स्थल बना।



Sanskrit: India's invaluable gift to the world

Sanskrit, language in which there is no error. A language which is so powerful in itself; no other language can be as effective in revealing the truths of human being so clearly. In other languages, those who make them have rituals, but in Sanskrit, there is no rituals, only pure energy, which is transformative for the nature of man and his thinking style. Sanskrit is the language of the Vedas, and Vedas are the name of the first stream of knowledge on this earth. Sanskrit came from the purest state of consciousness, and was born for the upward movement of consciousness.
Sanskrit is a great glory, it is full of the world's best poetry, fiction, quotes. Our sages who were among the world's best thinkers, made Sanskrit a medium to keep their inspiration in front of all humanity. No human being is perfect and pure, but Sanskrit and our culture associated with it is perfect in every way, carrying a divine mandate in itself, and originated from the spirit of welfare of the human community. Let it be recognized by its great purpose. It has taken the basis of experience and self-development above facts and logic.

For the promotion of good culture, we should make people familiar with the glory of Sanskrit. It should be made an ethical-social responsibility that we learn Sanskrit and become familiar with our culture, which celebrates divinity in human beings. Which signifies the overall welfare of this world, beyond any kind of man-made defects. This article is also being written for the purpose of giving him a place in the society according to his dignity.

Sanskrit stands true in the test of scientists. It directs his vision towards the central element which he seeks to define in the systems of matter but the answer seems to be found in the field of consciousness itself. Sanskrit explains the policy system for the implementation of cosmic energy, it was used for the same purpose.

This age-old language of sages shedding light on the deepest secrets of creation stands beyond the need of any kind of authentication- yet the things related to consciousness and the universe that have been formulated in its mantras have been found to meet the scientific criteria .

Scientists say that Sanskrit is a favorable language for their experiments and tests, looking at the accuracy with which it interprets mathematical formulas, it seems that the creator has created the universe in its harmony. It represents the origin, creation and eventual destruction of the universe from a conscious point of view, in which the dynamic cycle of the entire universe is explained with the support of consciousness. In the view of the sages, the planets and constellations were not just bodies of matter, but living symbols of a comprehensive adjustment, they were given analogies in the form of divine powers.
Because this language weaves all the inert consciousness into one formula, hence its usefulness becomes of special importance in Yagya-rituals. The mantras chanted by it have the ability to vibrate, vibrate, illuminate the subtle world.

Only then did the sages use it for their specific purposes, to solve some ultimate problem. They were familiar with its divine communication ability. They made a successful attempts to test and experiment with it. As a result, we became a part of a great culture, and this country hence is full of gratitude to them - it is called nurturer of the world, caregiver and it became the originator of a wonderful civilisation and culture.



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by Aarti Pathak
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